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    My Friends- मेरे गाँव के कुछ दोस्त

    "सिलसिला ज़िन्दगी का" के इस पोस्ट  में मैं आज अपने गाँव के कुछ दोस्तों को याद कर रहा हूँ। बहुत दिनों से सोच रहा था कि अपने ग्रामीण दोस्तों पर कुछ लिखूँ।

     तो आज मुझे मौका मिला। अपने ग्रामीण दोस्तों पर कुछ लिखने का। हालांकि अब तो हम सभी दोस्त शहरी हो गए हैं। लेकिन हमारी दोस्ती गाँव से शुरू हुई थी तो हम ग्रामीण दोस्त ही हुए।
    पहले तो मैं आप सभी दोस्तों को कहना चाहूंगा कि Oh My  friends! I Miss You!!


    और सबसे पहले मैं नाम लेना चाहूंगा सुनील ठाकुर, दादा का- (नौरंगा), ये एक बहुत ही प्यारे इंसान हैं। हर किसी के साथ हर हाल में खड़े रहना। हर किसी को सपोर्ट करना। हर किसी की खुशी में अपनी खुशी ढूंढ़ लेना। सुनील दादा इसी के लिए जाने जाते हैं। मैं देखता हूँ ये हमेशा सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं।  इनसे हमेशा बात होती है मेरी। सबके साथ मिल जुल कर रहना कोई इनसे सीखे।
    मैं अब थोड़ा फ्लैशबैक में आप लोगों को ले के चलता हूँ। गाँव में मेरी दोस्ती की कहानी शुरू हुई पांचवी कक्षा से।  उसी दौरान मेरी दोस्ती हुई कन्हैया साहू (नौरंगा) और मुकेश (नौरंगा) से। हम तीनों की तिकड़ी दोस्ती काफी प्रचलित थी। चलती रही। कई सालों तक। अभी भी चलती है। कन्हैया से। मुकेश से नहीं। क्योंकि मुकेश हम लोगों से खफ़ा हो चुका था और कुछ वर्ष पहले बहुत कम उम्र में ही दुनिया को अलविदा कह गया। 
    मुझे याद है 2015 में मैं जब घर गया था मुकेश मुझ से मिलने आया था। हम लोग बाज़ार गए थे। खूब मस्ती मज़ाक किये थे। इधर मुम्बई आने के बाद मुझे पता चला कि मुकेश पिछले कई सालों से कैंसर से पीड़ित था और ज़िन्दगी  का जंग वो हार गया। 
    मैंने नम आंखों से कहा था- "अलविदा मुकेश"-- लौट कर आ ना सके जहाँ में तो क्या, याद बन कर रहोगे दिलों में सदा"। हमेशा याद आते हो तुम।
    कन्हैया से आज भी बात होती है। कई सालों पहले उसकी नौकरी लग गई थी और आज शादी शुदा जीवन व्यतीत कर रहा है।
    सुनील ठाकुर, दादा- (नौरंगा), ये एक बहुत ही प्यारे इंसान हैं। हर किसी के साथ हर हाल में खड़े रहना। हर किसी को सपोर्ट करता। हर किसी की खुशी में अपनी खुशी ढूंढ़ लेना। सुनील दादा इसी के लिए जाने जाते हैं। मैं देखता हूँ ये हमेशा सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं।  इनसे हमेशा बात होती है मेरी। इसके अलावा और भी कई नए दोस्त बने हैं।
    मुझे याद है, मैट्रिक की पढ़ाई तक के सफ़र में नौरंगा और भुआल छपरा गाँव में मेरे बहुत दोस्त बने थे। हम दोस्तों का काफ़िला दियारा उच्च विद्यालय से पढ़ाई कर के जब रास्ते में जाते हुए दिखता था, तब एक शमां सा बंध जाता था।
    उन दोस्तों में से कई दोस्तों से बिछड़ने के बाद शायद ही कभी मुलाक़ात हुई। क्योंकि सब अपनी-अपनी दुनिया और अपनी-अपनी ज़िंदगी में इतने व्यस्त हो गए, किसी से मुलाक़ात ही नहीं हुई।
    वही कुछ दोस्त आज भी हमसे जुड़े हुए हैं। अच्छा लगता है उनसे बात कर के और जो नहीं जुड़े हैं, अच्छा लगता है उन्हें याद कर के।
    यह ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा यही दोस्तों! मिलना और बिछड़ना। ज़रूर किसी ना किसी मोड़ पर टकराएंगे। तो वादा है इसी तरह हाथ मिलाएंगे, एक दूसरे से लिपट जाएंगे।
    मैं जिन-जिन दोस्तों का नाम नहीं लिया, अगले पोस्ट में ज़रूर लिखूंगा उनके बारे में। अभी बहुत सारे दोस्तों के बारे में लिखना है। उनकी लिस्ट तैयार कर रहा हूँ। सबको याद करते हुए सबके बारे में लिखूंगा। क्योंकि मुझे दिल से भी आप सब प्यारे हैं MY FRIENDS.

    2 comments:

    1. Nahi...Bhula nahi hun...Next post aapke liye hoga special...dil rehane walo ko kaise bhul paaunag

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