तुम आना कभी पहली बारिश बनकर
कुछ अधूरी मोहब्बतें बारिश की पहली बूंदों की तरह होती हैं—अचानक आती हैं, दिल को भिगो जाती हैं और फिर उम्र भर याद रहती हैं।
तुम आना कभी
पहली बारिश बनकर,
जब आसमान कई दिनों से
चुपचाप उदास हो...
जब खिड़की के बाहर
सूनी गलियों में
मिट्टी की खुशबू तो हो,
मगर तुम्हारी आहट न हो।
तब तुम आना...
बिना कोई खबर किए,
बिना कोई दस्तक दिए,
बस यूँ ही अचानक
बूंदों की तरह
मेरी हथेलियों पर ठहर जाना।
मैं शायद पहचान न पाऊँ तुम्हें,
क्योंकि वक्त ने
चेहरों पर बहुत कुछ लिख दिया है...
मगर यकीन है,
तुम्हारी आवाज़ सुनते ही
मेरा दिल कह देगा—
"देखो, बारिश लौट आई है..."
तुम आना कभी
उस शाम की तरह
जिसमें सूरज ढलने के बाद भी
थोड़ी-सी रोशनी बाकी रहती है।
मैं तुमसे कोई सवाल नहीं करूँगा,
न पूछूँगा कि
इतने साल कहाँ थे...
बस चुपचाप
तुम्हारे पास बैठकर
उन सारी खामोशियों को सुनूँगा
जो हमने कभी
एक-दूसरे से कही ही नहीं।
अगर आँखों में आँसू हों,
तो उन्हें बारिश समझ लेना...
और अगर मैं मुस्कुरा दूँ,
तो समझ जाना
कि तुम्हारे जाने के बाद भी
मेरे भीतर कहीं
तुम अब तक ज़िंदा थे।
तुम आना कभी
पहली बारिश बनकर...
मैं भीगना चाहता हूँ
तुम्हारी यादों में नहीं,
इस बार तुम्हारे साथ।
इस बार
तुम्हारे जाने का डर नहीं चाहिए,
तुम्हारे लौटने का
एक छोटा-सा यकीन चाहिए।
क्योंकि कुछ लोग
बारिश की तरह होते हैं...
उनके आने से
सिर्फ मौसम नहीं बदलता,
इंसान भी बदल जाता है।
और तुम...
तुम मेरे लिए
वही पहली बारिश हो,
जिसका इंतज़ार
हर सावन से पहले
मेरा दिल करता है।
तुम आना कभी...
पहली बारिश बनकर।
कुछ रिश्ते खत्म होकर भी खत्म नहीं होते। वे यादों में, खामोशियों में और कभी-कभी बारिश की पहली बूंदों में लौट आते हैं। “तुम आना कभी पहली बारिश बनकर” ऐसी ही एक अधूरी मोहब्बत की कहानी है—जहाँ इंतज़ार अभी बाकी है और दिल को आज भी किसी के लौट आने की उम्मीद है।

0 Comments