सूरज को ढ़ल जाने दे - Silsila Zindagi Ka
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    सूरज को ढ़ल जाने दे



    मुट्ठी से अगर रेत फिसलती है तो फिसल जाने दे
    ये तन्हाई का मौसम है थोड़ा इसे  बदल  जाने दे

    एक  नया  सवेरा  ज़रूर  होगा  फिर  से देखना
    बस  आज  की शाम इस सूरज को ढ़ल जाने दे

    बीते हुए  कल की फिक्र में वक़्त जाया ना कर
    जो  आने  वाला  है  कल  बस वो कल आने दे

    ये गुस्ताख़ दिल है यूं कहां आसानी से मानता है
    थोड़ा समझौता कर इससे और इसे बहल जाने दे

    ये पल बेरहम है नहीं मिलेगा ज़ख्मों का मरहम यहां
    दर्द को सीने में छुपा और यह बेदर्द पल जाने दे

    फिर से एक नया इतिहास पैदा होगा ज़रूर एक दिन
    बस इन लड़खड़ाते कदमों को थोड़ा संभल जाने दे

    अब सुकूं की ज़िंदगी जीने का कोई बहाना ढूंढ "अनिल"
    तड़प और बेचैनी की किताबों को फाड़ और जल जाने दे
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