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    एक लुभावने मंज़िल पर पहुंचने की चाह में पीछे छूट जाते हैं कई सुहाने मंज़र

     

    कभी आपने सोचा है या कभी आप के मन में ये विचार आया है? कि एक लुभावने और निर्धारित मंज़िल पर जल्दी पहुंचने की चाह में हम अपने सफ़र में कई सुहाने मंज़र को पीछे छोड़ देते हैं। उन पर नज़र जाती है तो लालच से मन भर आता है। 

     और कुछ मंज़र तो ऐसे भी होते हैं, जिन्हें देखते ही अपने आप हमारे  मुंह से Wow निकल जाता है। लेकिन हम कभी ऐसा भी कहते हैं कि जब अपनी मंज़िल से वापस लौटेंगे तो यहां ज़रूर आएंगे।



    कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि हमें लौटते वक़्त उन मंज़र को देखने का मौक़ा मिल जाता है और कभी-कभी हम उस जगह पर चाहकर भी नहीं पहुंच पाते।


    और फिर, फिर क्या? ज़िन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मक़ाम, वो फिर नहीं आते। तो हम क्यों नहीं उन नज़ारों को उसी समय देख लेते हैं, वहां थम कर उन्हें छू लेते हैं, जिनसे सफ़र में मुलाक़ात हो रही है। क्या पता ये मक़ाम फिर आये या न आये? और वैसे भी किसी ने क्या खूब कहा है - ज़िन्दगी एक सफ़र है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना?



    कल पर कुछ ना छोड़ो। जो सफ़र में आये उससे हाथ मिलाते चलो और जो हाथ मिलाने आये, उसे गले लगाते चलो। वादियों से गुज़रते हुए, बिना थमे यूं तुम गुज़र न जाना। उस दीवाने मौसम से सराबोर मनमोहक मंज़र को देखकर यूं मुक़र न जाना....क्या पता फिर लौटकर तुम कब आओगे, और नहीं आये तो तुम बहुत पछताओगे। 



    जैसे मैं पछता रहा हूँ। एक मंज़िल पर निकला था, लेकिन तभी सफ़र में मुझे कई ऐसे मनमोहक नज़ारे दिखें जिसका मैं दीवाना हो गया। काली घटाएं, वो झूमती वादियों और उन वादियों के बीच मुस्कुराते पहाड़। सब अभी तक तैर रहे हैं। पर वहां थमकर उनसे मिल सका। उनसे बातें न कर सका। बस चलते-चलते ही तस्वीर ले सका, जो आप देख रहे हैं।



    बस मैं यही कहना चाहता हूँ कि जो अफ़सोस आज मुझे हो रहा है आपको न हो, इसलिए खूबसूरत मंज़र के बीच से गुज़रते हुए उनसे मिलते जाना, उनसे बातें करते जाना। क्योंकि, क्या पता ओ दूर के मुसाफ़िर!! ये पल फिर आये या नहीं।।

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