जलते दीये को न बुझाओ - Silsila Zindagi Ka
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    जलते दीये को न बुझाओ

    जलते   दीये  को  न  बुझाओ,   जलने   दो
    ज़िन्दगी  का   नाम  है   चलना,  चलने   दो

    सुबह, शाम  और  रात  होती  है  और होगी
    सूरज को इसी तरह ढ़लने और निकलने दो

    तुम्हारे  वज़ूद  की  कहानी  है सबसे अलग
    तुम ना बदलना  इस ज़माने  को बदलने दो

    ये  दिल कब  कहाँ  एक  राह पर चलता है
    अगर  बेचैन  होता  है तो  इसे  मचलने  दो

    ये ज़िन्दगी ख़्वाब के बिना अधूरी ही तो   है
    अगर आँखों में ख़्वाब आते हैं  तो पलने  दो

    अब मंज़िल क़रीब है बस पहुँच जाओगे अब
    चलते-चलते अब मत कह देना सम्भलने  दो

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