माँ को समर्पित कुछ पंक्तियाँ मेरी कलम से - माँ ने अपना आँचल ओढ़ाया. - Silsila Zindagi Ka
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    माँ को समर्पित कुछ पंक्तियाँ मेरी कलम से - माँ ने अपना आँचल ओढ़ाया.











    माँ ने   अपना   आँचल   ओढ़ाया 
    मेरी  ज़िंदगी  खुशनुमा   हो   गयी
    एक नज़र देख   लिया जी भर कर 
    मेरी   हर  बद्दुआ,   दुआ   हो   गयी. 

     मेरी    ख्वाहिशें     भी   रूठी   हैं 
    मेरे  सपने  भी   मुझसे  खफा  हैं
    पर मुझे परवाह नहीं इन सब की 
    क्योंकि   मेरे  पास  मेरी "माँ" है | 

    पतझड़  के   मौसम   में   भी  
    जो   बहार   लेकर   आती   है
    "माँ" तो  ग़मों के  दौर  में  भी 
    खुशियाँ बेशुमार लेकर आती है |

    मेरी    तन्हाई   में,   मेरी   परछाई   में 
    मेरी "माँ" की मोहब्बत साथ चलती है 
    तक़दीर खफ़ा हो कर क्या बिगाड़  लेगी 
    हर पल मेरी "माँ"की इबादत साथ चलती है|

    मेरी   शायरी, मेरी   ग़ज़ल, मेरे   नगमों   में 
    जो   ख़ूबसूरत   अलफ़ाज़   बनकर  आती  है 
    हजारों रंगों से रंगीन होती  है   मेरी   ज़िंदगी 
    मेरी "माँ"मेरे जीने का नया अंदाज़ बनकर आती है.

    मेरी    माँ की   हर  बात, हर   रोज़ 
    मुझे ज़िंदगी जीने का सीख देती है 
    मेरी कलम को भी खुद पर नाज़ होता है 
    जब ये आहिस्ता से "माँ" लिख देती है 

    COPYRIGHT@ANIL PANDEY

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