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    मैं ही शून्य, मैं ही साकार हूँ

    (सभी को मेरे BLOG की तरफ से स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। ) 


    इस आज़ादी के पावन अवसर पर आज एक विशेष और बेहतरीन कविता आप लोगों तक पहुंच रहा हूँ। जिसका शीर्षक है "मैं ही शून्य, मैं ही साकार हूँ". इस कविता को लिखा है "नलिन सौरभ" ने । 


    मैं ही शून्य, मैं ही साकार हूँ !

    मैं  निरंतर  हूँ, निराकार  हूँ  !! 

    मैं राम की मर्यादा, मैं रावण का अहंकार हूँ !

    मैं भरत की शीतलता, लखन का प्रहार हूँ !! 

    मैं भीष्म की प्रतिज्ञा, दुर्योधन का दुर्व्यवहार हूँ ! 

    मैं गंगा सी निर्मल, भक्ति सा निराधार हूँ !!  

    मैं ब्रह्मा की रचना, मैं ही शिव का संहार हूँ ! 

    मैं भूत की परिभाषा, मैं भविष्य का आविष्कार हूँ !! 

    मैं ही ज्ञान की रोशनी, अज्ञानता का अंधकार हूँ ! 

    मैं सीता का सतीत्व, मैं अहिल्या का उद्धार हूँ !! 

    मैं राधा का प्रेम, शूर्पणखा का व्यभिचार हूँ ! 

    मैं अर्जुन की शिष्टा, युद्धिष्ठिर का सद्विचार हूँ !! 

    मैं किसी राजा की निष्ठा, किसी ऋषि का परोपकार हूँ ! 

    मैं ही अतीत का सत्य, मैं ही भविष्य का आधार हूँ !! 

    मैं शून्य हूँ, मैं ही साकार हूँ ! 

    मैं निरन्त हूँ, मैं निराकार हूँ !!


    (दोस्तों! कैसी लगी आपको ये रचना, ज़रूर बताइये । आप मुझसे E-mail के ज़रिये भी जुड़ सकते हैं wonderfullworld6@gmail.com, और Website - www.missyou.in.net)

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