अब एक नई उड़ान भरते हैं - Silsila Zindagi Ka
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    अब एक नई उड़ान भरते हैं

    उड़ो, ख़ूब उड़ो, उन्मुक्त आकाश में जी भर कर उड़ो. इतना उड़ो कि पर्वत की ऊंचाई भी तुम्हारे परवाज़ के सामने छोटी पड़ जाए. अपनी इस परवाज़ से एक ऐसा इतिहास पैदा करो, जिस पर दुनिया नाज़ करे.



    हर गल्ली, हर सड़क, हर चौबारे पर 
    अपने क़दमों के निशा छोड़ जाओ.
    ये दुनिया तुम्हें चाह कर भी भूल ना पाए 
    तुम अपनी ऐसी पहचान छोड़ जाओ.

    दोस्तों! ज़िन्दगी तो बहुत लोग जीने की कोशिश करते हैं, लेकिन जी नहीं पाते हैं. उड़ान बहुत लोग भरना चाहते हैं, लेकिन उड़ नहीं पाते हैं. अपने मन में विश्वास तो बहुत लोग भरना चाहते हैं, लेकिन भर नहीं पाते हैं. 
    आपको पता है ऐसा क्यों होता है...? क्योंकि उन्हें ख़ुद पर भरोसा नहीं आता. वो ख़ुद से ज़्यादा अपनी तक़दीर पर या किसी और भरोसा करते हैं और यही वज़ह होती है कि वो हार जाते हैं. 
    कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अपनी ज़िन्दगी की शुरुवात से पहले ही हार मान लेते हैं और कहते हैं "अब नहीं होगा". 

    लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपनी तक़दीर ख़ुद के हाथों लिखते हैं और तक़दीर उनके जीवन का फैसला नहीं बल्कि वे लोग अपनी तक़दीर को उँगलियों पर नचाते हैं. और कहते हैं- "I am the creator of my own destiny"
    माना कि आप हर बार, बार-बार की कोशिशों के बाद भी हर जाते हैं. लेकिन आपको शायद नहीं पता कि इसके ज़िम्मेवार भी आप ही हैं. 

    आप अगर जीतना चाहते हैं, अपनी ज़िन्दगी को एक नई उड़ान देना चाहते हैं, तो ख़ुद को बदलिए और रोज़, बार-बार कहिये ......फिर देखिये आपकी ज़िन्दगी की एक नई शुरुवात हो जाएगी. 

    अपना एक लक्ष्य बनाइये- जिस तरह द्रोणाचार्य अपने सभी शिष्यों से पूछ रहे थे कि तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है...? किसी ने कहा कि मुझे चिड़िया का पंख दिखाई दे रहा है, किसी ने कहा कि चिड़िया का पांव दिखाई दे रहा है. लेकिन जब अर्जुन की बारी आई तो अर्जुन ने कहा- गुरुदेव, मुझे चिड़िया की आँख दिखाई दे रही है. बस आपको भी चिड़ियाँ की आँख ही दिखाई देनी चाहिए. मतलब कि आपको अपना एक लक्ष्य तै करना है और आगे बढ़ना है. फिर एक दिन आपको अपने लक्ष्य तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता है. 

    यकीन करो तुम सर्वश्रेष्ठ हो- एक आदमी धावक था. बहुत अच्छा दौड़ता था. शायद उससे अच्छा ही कोई दौड़े. फिर भी वो आज तक कभी कोई रेस नहीं जीत पाया था. एक दिन उसे एक आदमी बोला, जो कभी धावक हुआ करता था. लेकिन अब बुड्ढा हो चला था. उस आदमी ने बुड्ढे धावक को अपनी समस्या बताया और कहा मैं बार-बार क्यों हर जाता हूँ रेस...जबकि मैंने देखा है मुझसे अच्छा कोई नहीं दौड़ता है. बुड्ढे धावक ने उससे पूछा- जब तुम दौड़ रहे होते हो तो क्या सोचते हो...? तो उस ज़वान धावक ने कहा कि जब मैं दौड़ रहा होता हूँ और जब भी मेरे नज़दीक कोई दुसरा धावक पहुँचने लगता है...बस मेरे मन में यही ख्याल आ जाता है कि यह मेरे से कहीं आगे न निकल जाए. आगे निकल गया तो फिर मैं इसे कैसे पकड़ पाऊंगा. यही सोचते-सोचते मेरी रफ़तार ढ़ीली पड़ जाती है और पीछे वाला धावक मुझ से आगे निकल जाता है. तो उस बुड्ढे धावक ने उसे समझाते हुए कहा कि "बस यही तुम्हारी हार की वज़ह है. क्योंकि तुम अपनी रफ़्तार पर भरोसा न कर के दुसरे धावक की रफ़्तार पर भरोसा कर बैठते हो और हार जाते हो. अगली बार से जब भी दौड़ना कोई तुम्हारे नज़दीक क्यों न आ जाए बस तुम यही सोचना कि तुम सर्वश्रेष्ठ हो. फिर देखना, तुम कोई बाज़ी नहीं हारोगे. और वाक़ई ऐसा ही हुआ. उसके बाद वो धावक एक भी रेस नहीं हारा. क्योंकि वो ख़ुद को समझ गया था कि "I am The creator of my own destiny".
    तो दोस्तों! आज से आप भी अपने आप पर भरोसा करना शुरू कर दो. और किसी भी परिस्थिति में हार मत मानो और तब तक ना रुको जब तक तुम मंज़िल तक ना पहुँच जाओ. 

    चट्टानों सा मज़बूत हो जाओ, और ख़ुद दे कहो- " अब एक नई उड़ान भरते हैं". 

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