किसी के हुस्न पर ग़ज़ल लिखता हूँ - Silsila Zindagi Ka
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    किसी के हुस्न पर ग़ज़ल लिखता हूँ


    मैं रोज़ लिखता हूँ। 
    अपनों के किस्से लिखता हूँ 
    बेगानों की कहानी लिखता हूँ। 
    किसी के हुस्न पे ग़ज़ल लिखता हूँ
    अपने ग़ज़ल में किसी की ज़वानी लिखता हूँ।।
    हर शब्द को मैं जीता हूँ
    और ये शब्द ही मेरे अन्दाज़ हैं।
    मुझे जीने का जुनूं देते हैं
    जो मेरी कलम और जो मेरे अल्फ़ाज़ हैं।



    दोस्तों! बचपन से ही मुझे शब्दों से प्यार था। ऐसा लगता था कि मैं शब्दों के लिए बना हूँ और शब्द मेरे लिए। गीत और ग़ज़ल से शुरू हुआ मेरा यह सफ़र मुझे आज बहुत दूर तक ले कर चला आया है। 
    लेखक की बनने की ख़्वाहिश ने मुझे सब कुछ छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मुझे हर क़ीमत पर लेखक ही बनना है, मैंने ठान लिया था।
    लेखक बनने के दौर में जाने कितने-उतार चढ़ाव से मेरी ज़िन्दगी गुज़रती रही है और आज भी गुज़र रही है। लेकिन, मैंने किसी भी परिस्थिति में अल्फ़ाज़ों को चुनना और उन्हें पिरोकर एक धागे में बुनने का काम रोज़ करता हूँ। क्योंकि-

    ये शब्द मेरी जान हैं
    शब्द मेरी पहचान हैं।
    शब्द मेरी ज़िन्दगी हैं
    शब्द मेरी शान हैं।

    शायद, शब्दों का यही प्यार और शब्दों से यही लगाव मुझे मुम्बई लेकर आ गया। लेखक बनने का सपना लिए जब मैं मुम्बई आया तो यह दुनिया मेरे लिए नई थी और अज़नबी भी।
    लेकिन वक़्त के साथ-साथ मैं यहाँ भी आगे बढ़ता गया। लोग मिलते गए और रिश्ता जुड़ता गया। और आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सभी मुझे अपने ही खड़े नज़र आते हैं।
    और कुछ तो नहीं, लेकिन इस शहर में मुझे चाहने वाले बहुत हैं। मुझे प्यार करने वाले बहुत हैं। और मैं भी उनसे बहुत प्यार करता हूँ।

    मैं परिस्थिति का सामना डंटकर करता हूँ। मुश्किलों से मुस्कुरा कर लड़ता हूँ। ज़िन्दगी जीता हूँ शान से और शान से आगे बढ़ता हूँ।

    मैं  लेखक  हूँ  और  लेखक  ही  रहना चाहता हूँ
    अपने दिल की हर बात आपसे कहना चाहता हूँ।
    मुस्कुरा कर, ज़िन्दगी  को गले लगाकर जीता हूँ
    हवाओं    की  तरह    अनवरत  रोज़   बहता  हूँ।।

    मेरी कहानी में तुम्हारी ज़िन्दगी मिलेगी
    मेरी  ग़ज़ल में  तुम्हारी   खुशी  मिलेगी।
    मेरे किस्से में तुम्हारी क़ामयाबी दिखेगी
    मेरे नज़्म में रोज़ तुम्हारी बंदगी दिखेगी।।






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