चाँद बहुत शरमाया है - Silsila Zindagi Ka
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    चाँद बहुत शरमाया है


    बालों का गजरा गमक  उठा
    माथे की बिंदिया चमक उठी
    छा गया  वसन्त  पतझड़ में
    ज़िस्म की खुश्बू महक उठी

    कल रात को छत पर गोरी ने
    अपने घूँघट को हटाया है।
    देख के उसके रूप को
    चाँद बहुत शरमाया है।

    कुछ बात तो है इस गोरी के
    मादकता   सी  आँखों   में।
    आई है कहाँ से रुप की रानी
    वो एक है करोड़ों लाखों में।।

    किसी कवि की गहरी  सोच  है या
    फिर है वो किसी शायर की ग़ज़ल।
    या वो  किसी  रंगरेज़ की है रचना
    या किसकी है वो कलम की कँवल।।



    है हर अदा क़ातिलाना उसकी
    मुस्कान  बहुत  ही निराली है।
    है  उतरी  स्वर्ग  से परी  कोई
    छाई हर  तरफ़  हरियाली  है।।

    जाने कौन, इसे किस पल में
    इतनी शिद्दत से बनाया है।
    देख के उसके रूप को
    चाँद बहुत शरमाया है।



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