• Welcome To My Blog

    मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन

    दोस्तों! जब हमें अपने बचपन की तस्वीर घर के किसी कोने में, वर्षों से पड़े बॉक्स में मिल जाती है, तो हमारा चेहरा खिल उठता है. और हमारे मुंह से अनायास ही निकल पड़ता है, वाह! हम ऐसे थे? वाक़ई, तब हमने अपना बचपन हमारी आँखों के सामने तैरने लगता है और हम बोल पड़ते हैं... कहाँ गया वो बचपन?


    ये भी तो सच है. जब हम छोटे थे तो बड़े होने की चाहत थी और आज जब बड़े हो गए हैं तो फिर से छोटा बन जाना चाहते हैं. उसी बचपन के दौर में चले जाना चाहते हैं, जहाँ ना तो रिश्तों का ग़म था, ना किसी चीज़ की बंदिश. बस बेपरवाह, अपनी मस्ती की धुन में ही रहते थे. 
    वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी, वो मिट्टी के घरौंदे, वो रूठना-मनाना...सब जैसे बीते हुए दौर की कहानी बन गयी. वो बचपन कितना अनमोल था, इसका पता आज हमें चल रहा है जब हम बड़े हो गए हैं. 
    दोस्तों! बचपन से बड़ा अनमोल तोहफा और अनमोल पल एक इंसान के लिए हो ही नहीं सकता. ये वो दौर है जिसमें ना तो इंसानियत, ना ही कोई अनुशासन की फ़िक्र होती है, इसमें तो सिर्फ और सिर्फ सभी बचपन और उस बचपन की मासूमियत ही देखा करते हैं. 
    बड़ों को देखकर बचपन में बड़ा होने की चाहत और आज किसी बचपन को देखकर फिर से बच्चा हो जाने की चाहत हमें कितना दर्द दे जाती है? लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते हैं, क्योंकि यही है "सिलसिला ज़िंदगी का''. 
    जब बच्चे थे तो कहीं भी, कभी भी हंस देते थे, रो पड़ते थे. लेकिन आज हम जब हँसते भी हैं तो उसकी वजह पूछी जाती है और रोते हैं तो छुपकर कि कहीं कोई हमारे रोने की वज़ह न पूछ दे.  
    जब छोटे थे तो हमसे कोई हमारा हाल भी नहीं पूछता था और आज हर मोड़ पर जो भी मिलता है हाल पूछता है और हमें हँसते हुए अपना हाल "ठीक है" कहना पड़ता है. 
    जब बचपन के दौर में थे तब भी रोज़ भागते थे और आज भी रोज़ भागते हैं. पर दोनों में फर्क यही है कि हैब हम बचपन में भागते थे तब हमारी कोई मंज़िल, कोई ठिकाना नहीं होता था और आज जब हम भागते हैं तो सिर्फ मंज़िल और किसी ठिकाने के लिए, जिस भागदौड़  में ज़रा भी सुकून नहीं है. 
    सब कुछ बदल गया है. जो हम सोच रहे हैं आज वो कल की कहानी है. जो शायद इतिहास है, जो सिर्फ हमारी याद है और याद ही रहेगी. क्योंकि ज़िंदगी के सफर  में गुज़र जाते हैं, जो मक़ाम वो फिर नहीं आते. 
    खैर, कभी-कभी हम यही सोचते हैं कि अगर कोई आ कर हम से पूछे कि तुम्हें क्या चाहिए ? तो हम ज़रूर यही बोलेंगे " ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो....मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन".
    दोस्तों! आप बचपन के बारे में क्या सोचते हैं? क्या आप भी अपने उस बचपन को मिस करते हैं, जो हम से बहुत दूर चला गया है. आप बताईये अपना नज़रिया. 

    Featured Post

    TV Show: बिग गंगा और Zee5 पर देखिये मेरा नया कार्यक्रम "मस्त मलंग भोले बाबा के बम"

    TV Show: बिग गंगा और Zee5 पर देखिये मेरा नया कार्यक्रम "मस्त मलंग भोले बाबा के बम" प्रोग्राम- मस्त मलंग भोले बाबा के बम चैन...