मानवता का दीप जले जब
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मानवता का दीप जले जब

MANVATA KA DEEP JALE JAB।।DIWALI POEM।।RAJESH PANDEY

क्या सिर्फ दीप जला लेने को ही दिवाली कहते हैं? क्या मिठाइयां खाने और खिलाने को ही दिवाली कहते हैं? नहीं!! वास्तविक दिवाली तो तब होगी जब हम मानवता का दीप जलाएंगे। क्योंकि ये वो दीप है जो कभी बुझता ही नहीं। 

कुछ ऐसी ही दिवाली हम मनाने जा रहे हैं "राजेश पाण्डेय" की एक कविता के साथ "मानवता का दीप जले जब"।

मिटा ना पाए मन का अँधेरा,
ये दीप जलाना धोखा है।
मर्ज़ी सबकी अपनी-अपनी,
किसने किसको रोका है।।

नफ़रत का दीया बाती ले,
डाला तेल बेईमानी का।
स्वार्थ में डूबा मानव तू,
क्या कहना तेरी नादानी का।।

जीवन को वरदान समझ,
अभिमान जला तू अंदर का।
होता मीठा नदिया का पानी,
खारा विशाल समंदर का।।

ये चाँद चमकता सूरज से,
तनिक है इसको शान नहीं।
देख लो जा के सूरज को भी,
इसका उसे गुमान नहीं।।

कर ले लाख उजाले फिर भी,
ये रात हमेशा काली होगी।
मानवता का दीप जले जब,
उस दिन नई दिवाली होगी।।

मेरे दिल की ख़्वाहिश है कि हर दिवाली पर हर किसी के घर में दीप जले। हर दिल में प्रेम का दीप जले। पूरे ब्रह्मांड में कोई भी ऐसा व्यक्ति ना बचे, जो दुखी और उदास रहे। हमेशा मानवता का दीप जलता रहे। इसी कामना के साथ सभी को HAPPY DIWALI- RAJESH PANDEY

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