वो पुरुष ही नहीं- महापुरुष थे, वो ज्ञाता ही नहीं- महाज्ञाता थे, वो विचारक ही नहीं- महाविचारक थे - Silsila Zindagi Ka
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    वो पुरुष ही नहीं- महापुरुष थे, वो ज्ञाता ही नहीं- महाज्ञाता थे, वो विचारक ही नहीं- महाविचारक थे





    जब तक लाखों लोग भूखे और अज्ञानी हैं, तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूँ, जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वही उसकी ओ ध्यान नहीं देता. इस तरह की कई शिक्षाप्रद बातें करने वाला महापुरुष आज हमारे बीच नहीं है, पर उस महापुरुष  की कही हुई बातें आज भी हर किसी को उज्जवल जीवन जीने और सही मार्ग पर जाने के लिए प्रेरित करती है. वो पुरुष ही नहीं- महापुरुष, ज्ञाता ही नहीं-महाज्ञाता, विचारक ही नहीं- महाविचारक, जिन्हं दुनिया स्वामी विवेकानन्द के नाम से जानती है. जिनके मुंह से निकली हर बात आज हर किसी के लिए प्रेरणा का श्रोत है. भारत के इस महापुरुष का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था और इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्ता, जो कलकत्ता हाई कोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे. विश्वनाथ पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे और वे नरेंद्र को भी इसी राह पर चलने के प्रेरित करते थें. पर नरेंद्र नाथ को अपने पिता की राहों पर चलकर कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि उन्हें अपनी राहों पर चलकर एक महान-पुरुष बनना था.

    रवीन्द्र नाथ टैगोर कभी भी स्वामी विवेकानंद से नहीं मिले, फिर भी उन्होंने उनमें भारत का दर्शन कर लिया था. और कहा था.

    अगर आपको भारत के बारे में जानना है तो स्वामी विवेकानंद के बारे में जानिये. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे,नकारात्मक कुछ भी नहीं. 

    उनकी माता भुवनेश्वरी देवे धार्मिक विचारों वाली महिला थीं. उनका प्रभाव स्वामी विवेकानन्द पर पड़ा और झुकाव भी धर्म की ओर हो गया. 25 वर्ष की उम्र में स्वामी विवेकानंद ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया. इसके बाद तो उन्होंने पैदल ही पूरे भारत वर्ष की यात्रा कर डाली. 

    विवेकानंद बड़े स्वप्नद्रष्टा थें. उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जिसमें धर्म या जाती के आधार पर मानुष-मनुष्य में कोई भेद ना रहे. उन्होंने वेदान्त के सिद्धांतों को इसी रूप में देखा. उन्होंने देश के हर व्यक्ति को एक नई राह पर चलने के लिए प्रेरित किया, जिससे एक नए भारत का ही नहीं, एक नए युग का निर्माण हो सके. 

    स्वामी विवेकानंद केवल संत ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव प्रेमी भी थे. जब उनके अन्दर कुछ जानने की भावना उत्पन्न हुई तो, सबसे पहला सवाल उन्होंने खुद से ही किया. ये सत्य क्या है? ग़लत क्या है? ईश्वर क्या है? 
    और यही सवाल नरेंद्र ने एक दिन अपने प्राध्यापक से पूछ डाला.....सर आपने इश्वर को देखा है? तब उनके प्राध्यापक ने कहा था- नहीं बेटा मैंने ईश्वर को नहीं देखा...लेकिन तुम देख सकते हो, क्योंकि तुम्हारी आँखें योगी जैसी हैं. 
    फिर क्या था, इस बात का प्रभाव स्वामी विवेकानंद पर कुछ यूं पड़ा कि खुद से सवाल पूछने वाला ये योगी दुनिया के उत्तर देने के योग्य बन गया और जन-जन को प्रेरित करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा- "उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ. अपने नर जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त ना हो जाए".

    1881 में स्वामी विवेकानंद को ऐसे महापुरुष से मुलाक़ात हुई, जिनसे ना वो प्रभावित हुए बल्कि हमेशा के लिए वो उनका शिष्य बनकर रह गए. वो महापुरुष थें "रामकृष्ण परमहंस". इन्होने जब पहली बार विवेकानंद को देखा तो उनका हाथ पकड़ लिया और बोला- तुक्ष इंसानों के सामने बोलते-बोलते मेरी जिह्वा सूखी हुयी है.अब तुझे देखकर ऐसा लग रहा है कि मेरे सामने साक्षात ईश्वर आ गए हैं. तू कोई साधारण इंसान नहीं है नरेन, तुम्हारा जन्म मानव जीवन के उद्धार करने के लिए हुआ है. आओ मेरे पास बैठो. 

    सन 1893- जब शिकागो में विश्व धर्म परिषद का सम्मलेन चल रहा था. स्वामी विवेकानंद उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे थे. और वहाँ सभी ने प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को बोलने का अवसर ही ना मिले. लेकिन एक अमेरिकन प्रोफ़ेसर के प्रयास से स्वामी विवेकानंद को बोलने का थोड़ा समय मिला. और जब उन्होंने संबोधन किया तो सभी चौक गए. "अमेरिका के भाईयों एवं बहनों"
    उनका ये संबोधन अमेरका और यूरोप के लोगों के हृदय को छू गया और विवेकानंद ने आगे बोलना शुरू किया, जिसे बिना रोके-टोके हर कोई सुन रहा था. थोड़ा सा समय नहीं देने वाले लोग घंटों तक उनका भाषण सुनते रहें.

    तो ऐसे थे हमारे महापुरुषस्वामी विवेकानन्द. आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब तक ये संसार रहेगा, उनके द्वारा कही हुयी हर बात समय-समय पर लोगों के लिए प्रेरणा का शर्तो बनती रहेंगीं.
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