मैं सिनेमा के लिए बना हूँ और सिनेमा मेरे लिए- दुर्गराज आलोक दर्शी - Silsila Zindagi Ka
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    मैं सिनेमा के लिए बना हूँ और सिनेमा मेरे लिए- दुर्गराज आलोक दर्शी





     बहुत भीड़ है फिल्म इंडस्ट्री में. आसान नहीं है, आसानी से इस सफ़र को तय करना. आसान नहीं है फिल्म   इंडस्ट्री. यहाँ रोज़ मरना होता है और रोज़ जीना होता है.आप यहाँ अपनी मंजिल को तभी हासिल कर सकते हैं,   जब आपके अन्दर जूनून के साथ-साथ जिद्द है. आप यहाँ कई बार लड़खड़ाएंगें, कई बार संभलेंगें, कई बार   गिरेंगें, लेकिन फिर भी आपको चलना है और हर हाल में आगे बढ़ना है, वरना अप ज़िंदगी और फिल्म इंडस्ट्री की दौड़ से पीछे हो जायेंगें. ये सारी बातें हमसे शेयर की बेहतरीन अभिनेता और निर्देश और इन सब से भी बढ़कर   बेहतरीन इंसान ” दुर्ग राज आलोक दर्शी” जी ने. जिनकी हिन्दी फिल्म “प्यार की पंछी” इसी साल सिनेमाघरों में   रीलिज़ हुई है और इनकी एक्टिंग को दर्शकों ने बहुत प्यार दिया है. अचानक मेरी इनसे मुलाक़ात हुई और इनसे   मैंने बातचीत की. उसी बातचीत का कुछ हिस्सा मैं अपने ब्लॉग "सिलसिला ज़िंदगी का" के ज़रिये आपलोगों   तक पहुंचा रहा हूँ.
    . आलोक जी, आप अपने बारे में बताईये?                                                                                     
     मेरा नाम दुर्गराज आलोक दर्शी है और मैं उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के कटाई गाँव से बिलांग करता हूँ. मेरे   पिता जी का नाम राजेन्द्र प्रसाद है.
    . फिल्म इंडस्ट्री में आपका कैसे आना हुआ?
     वैसे तो बचपन से मेरा झुकाव फिल्मों की तरफ था. जब स्कूल में मैं पढ़ाई करता था. लेकिन एक्टिंग का ये कीड़ा   मेरे अन्दर कहाँ से समाया आज तक मुझे भी पता नहीं चल सका. बस एक बार सिनेमा शब्द दिमाग में आया और  आज तक बरकरार है. हालांकि स्कूल के समय में मैं नाटक में भाग लिया करता था. उसमें मेरी एक्टिंग की   सभी तारीफें किया करते थे. मैं कई जगह नाटक का मंचन करने जाता था और सबका दिल जीत कर आता था.   यहाँ तक कि लोगों के सामने जब एक्टिंग करता था तो उनमें से कुछ लोग मेरी एक्टिंग को देखकर मुझसे कहते थे कि तुम एक दिन एक्टर बनोगे. समय आगे बढ़ते गया और मेरा रुझान भी पूरा  इसी  तरफ बढ़ता गया.  इंटर की   पढ़ाई पूरी करने के बाद तो मैंने ठान ही लिया कि अब मुझे एक्टर ही बनना है, चाहे जो भी हो जाए. तो फिर मैंने अपने मन की यह बात अपने पिता जी को बताई.
    .तो आपके पिता जी का क्या रिएक्शन था इस पर ? उन्होंने  मना किया या ?
     ( मुस्कुराते हुए, बीच में ही ) बिल्कुल नहीं मना किया. हाँ, उन्होंने मुझसे यह बात ज़रूर कही कि अगर तुम्हें   एक्टर ही बनना है तो इसकी पढ़ाई करो. एक्टिंग की बारीकियां सीखो. क्योंकि किसी भी चीज़ में आगे बढ़ने के   लिए सबसे पहले उसको जानना और सीखना बहुत ज़रूरी होता है. तो सबसे पहले तुम एक्टिंग को जानो और   फिर जाओ. मुझे उनकी बातें अच्छी लगी और फिर मैं “इलाहाबाद यूनिवर्सिटी " चला आया और  मैंने डिसाईड   कर लिया कि “इलाहाबाद यूनिवर्सिटी” में ही “फिल्म एंड थियेटर” से एम.ए. करूँगा और मेरा एडमिशन हो भी   गया और वहाँ पर “सचिन तिवारी” सर जो वहाँ के एच.ओ. डी. थे, उन्होंने मेरा बहुत सपोर्ट किया और वहाँ मुझे   अभिनय की बारीकियां बखूबी उनसे सीखने को मिली और कहते हैं कि जब आपको मार्ग दर्शन करने वाला कोई   मिल जाए तो आपको मुश्किल राह भी आसान लगने लगता है. यहीं कुछ हुआ मेरे साथ. थियेटर का मेरा सफ़र   शुरू हुआ और इस दौरान कई बड़े लोगों से मेरी मुलाक़ात हुई. लोग जुड़ते गए, मेरा हौसला बढ़ता गया और   ज़िंदगी की गाड़ी जैसे रफ़्तार पकड़ने लगी. और एक व्यक्ति का नाम लेना मैं नहीं भूलूंगा, जो मेरे सफ़र में  आज   तक मेरा साथ दे रही हैं, जिनका मेरी ज़िंदगी में एक महत्वपूर्ण स्थान है वो हैं “विदु खरे दास” जी. जो हर कदम   पर मेरा मार्ग दर्शन करती रहीं.
    .और इलाहाबाद से आप सीधे मुम्बई चले आये?
     नहीं, इसके बाद मैं  “फिल्म एंड थियेटर ” डिपार्टमेंट से एम.फिल. करने के लिए वर्धा यूनिवर्सिटी चला गया.   दरअसल, मैं चाहता था कि थियेटर की, सिनेमा की हर बारीकी को सिख लूं और तब फिल्म इंडस्ट्री में आऊँ.   इसलिए अपनी आगे की पढ़ाई मैंने ज़ारी रखी.वर्धा यूनिवर्सिटी में एडमिशन हुआ और यहाँ भी मैंने बहुत कुछ. ना   सिर्फ यहाँ रंगमंच सीखा बल्कि सिनेमा के हज़ारों रंग मेरे अन्दर यहाँ समाहित हए और यहाँ से एम.फिल.     कम्प्लीट  करने के बाद मैं मुम्बई चला आया.
    .कितने साल हो गए आपको मुम्बई आये हुए ?
     करीबन चार साल.
    .मुम्बई में इन चार साल का आपका सफ़र कैसा रहा ?
     अच्छा रहा. पर उतार-चढ़ाव बहुत है यहाँ. बहुत भीड़ है. आसान नहीं है, आसानी से सफ़र को तय करना. लम्बी  लाइन है. सबको पहुँचने की ज़ल्दी है. लेकिन, हर कोई कहाँ पहुँच पाता है. फिर भी मैं कहूँगा कि मेरा   सफ़र यहाँ का बहुत अच्छा रहा और अभी भी अच्छा जा रहा है. 
    . इन चार वर्षों में आपने कौन-कौन सा प्रोजेक्ट किया?
      मैंने यहाँ कई शार्ट फिल्म्स में  एक्टिंग भी किया और इसके अलावा कई शार्ट फिल्म्स और कई म्युज़िक एल्बम   में   मैंने निर्देशन भी किया है. क्योंकि एक एक्टर के अलावा एक अच्छा निर्देशक भी हूँ. मैं एक बात आपको और  बता दूं कि "मैं सिनेमा के लिए बना हूँ और सिनेमा मेरे लिए". और जैसा कि आपको ज्ञात ही  होगा,   कुछ समय पहले मेरी एक फीचर फिल्म "प्यार की पंछी" भी रीलिज़ हुई थी. उसमें भी मेरे अभिनय को लोगों ने   खूब सराहा था.
    .हाँ, हाँ आपकी फिल्म “प्यार की पंछी” रीलिज़ हुई थी, बताईये कुछ इसके बारे में ?
    बहुत ही प्यारी फिल्म है. दर्शकों को बहुत पसंद आई. मुझे इस फिल्म में अपने किरदार से खेलने का मौक़ा मिला था और मैंने इसका भरपूर फायदा भी उठाया था.
    .इस फिल्म में आपकी क्या भूमिका रही है? कौन सा किरदार निभाया है आपने ?
    जी, इस फिल्म में मेरा कॉमिक रोल है और लोगों ने मेरे किरदार को बहुत पसंद किया. जिसने भी ये फिल्म देखी, उसने मुझे फोन किया और बहुत बधाइयां दी और हर किसी ने एक ही बात बोली ” जब फिल्म चल रही थी तो तुम्हारे सीन का सारे दर्शकों को इंतज़ार रहता था, क्योंकि जैसे ही तुम्हारा सीन आता था तो ज़बरदस्त हास्य माहौल पैदा हो जाता था और पूरा सिनेमा हॉल तालियों से गूंजने लगता था”.
    .वाह !! क्या बात है ? बहुत खुशी हो रही है मुझे यह जानकर. 
    बिल्कुल !! दर्शकों के दिल को आप छू लें…एक कलाकार के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है !!
    .अपने कुछ अन्य प्रोजेक्ट्स के का नाम बतायेंगें, जिसमें आपने कोई किरदार किया हो?
    दूरदर्शन के लिए मैंने “शालिनी” धारावाहिक में छात्र नेता का किरदार निभाया. “अशोका” में वैद्य का कैरेक्टर किया और “सावधान इंडिया” में एज ए विलेन परदे पर आया. “क्राईम पेट्रोल” में भी काम करने का मौक़ा मिला. साथ ही साथ दीवाने-अनजाने, आरम्भ इन सब शो में भी मैंने कैरेक्टर प्ले किया. इसके अलावा तकरीबन बीस से भी ज़्यादा शर्ट फिल्मों में मैंने काम किया है.जिनमें मेरी फेवरेट फिल्म है “कफन”. जो मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित है. जिसे मैंने खुद निर्देशित भी किया है. इस फिल्म को दर्शकों का खूब प्यार मिला है.
    .वाह !! क्या बात है ? आप एक्टर के साथ-साथ निर्देशक भी हैं?
    जी हां. मुझे निर्देशन की बारीकियां भी बखूबी पता है. मैंने फिल्म एंड थियेटर डिपार्टमेंट में निर्देशन की भी पढ़ाई की है. (मुस्कुराते हुए ) अच्छा लगता है निर्देशन करना भी
    . अब तो आपके परिवार के लोग, आपके दोस्त बहुत खुश होंगें?
      बिल्कुल, परिवार के लोगों के अलावा हमेशा मेरे गाँव के दोस्तों का फोन आता रहता है और सभी से मेरी बात होती है.
    . आप इसी तरह आगे बढ़ते रहिये, अपना मक़ाम हासिल करते रहिये और हम दिल से दुआ करेंगे कि "सिलसिला ज़िंदगी का" आपका अनवरत चलता रहे. 
      धन्यवाद !!
    इतफाकन ही सही, ये मुलाक़ात मेरे लिए यादगार रहेगी. 
    .मेरे लिए भी. बहुत अच्छा लगा आपसे बात कर के और मिलकर.
    .भविष्य के लिए आपको बहुत-बहुत बधाईयाँ.
      जी. बहुत-बहुत धन्यवाद!!. 
    तो दोस्तों!! ये थे फिल्म  अभिनेता और निर्देशक दुर्गराज आलोक दर्शी जी. आपको कैसा लगा ये साक्षात्कार आप मुझे ज़रूर बताईये. तो फिर ज़ल्दी ही मिलता हूँ आपसे कुछ नई चीज़ों के साथ. तब तक यही दुआ है दिल से कि  "सिलसिला ज़िन्दगी का"  आपका यूं ही चलता रहा.

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