मेरा गाँव बदल रहा है, देखिए मेरे गाँव को - Silsila Zindagi Ka
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    मेरा गाँव बदल रहा है, देखिए मेरे गाँव को

    I Love My Village... So I always write Article. 

    मेरा गाँव बदल रहा है। और यहां के लोग बदल रहै हैं। साथ ही साथ मेरे गांव  के लोगों की सोच भी बदल रही है।
    देखिए मेरे गांव को।।

    फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर कुछ दिन पहले मुझे कुछ तस्वीरें देखने को मिलीं. एक ख़ूबसूरत सड़क और उस सड़क के किनारे बैठकर मुस्कुराते हुए लोग. मैंने गौर से देखा और पहचानने की कोशिश करने लगा कि ये कौन सी सड़क है. जो लोग सड़क किनारे बैठे हुए थे उनको तो मैं पहचान गया. क्योंकि वे मेरे गाँव के लोग थें. पर ये सड़क कौन सी है..?  थोड़ी देर तक देखने के बाद मुझे प्रतीत हुआ कि ये सड़क भी मेरे गाँव की है. क्योंकि इस रास्ते से मैं कई बार गुज़र चुका हूँ. फिर क्या, मेरे चेहरे पर मुस्कान दौड़ गयी. और ऐसा हो भी क्यों ना, क्योंकि ये सड़क नहीं बल्कि दियारा क्षेत्र में बसे हमारे गांवों की वो काया-कल्प है, जिसका बदलने का हम वर्षों से इंतज़ार कर रहे थें. 

    आज़ादी के 70 वर्षों के बाद ये सड़क जो दियारा क्षेत्र के हमारे गाँव से गुज़र रही है, ये सिर्फ गुज़रती हुई सड़क नहीं है, बल्कि इसमें हमारे गाँव के लोगों के भविष्य की कई कहानियां छुपी हुई हैं. 

    याद है मुझे, हमारी मैट्रिक तक की पढ़ाई गाँव में ही हुई है. हमारे गाँव में स्कूल ना होने की वज़ह से हम सभी छात्र सायकल से रोज़ 9 किमी की दूरी तै कर के दुसरे गाँव में स्थित हाई स्कूल में पढ़ने जाया करते थें. गर्मी और सर्दी के मौसम में तो कोई समस्या नहीं होती थी, पर जैसे ही बारिश दस्तक देती थी हम लोगों के सामने समस्या खड़ी  हो जाती थी. वज़ह थी, सड़क. क्योंकि हमारे  गाँव से स्कूल तक जाने के लिए कोई भी पक्की सड़क नहीं थी. कच्चे रास्तों से ही हमें गुज़रना पड़ता था. कभी-कभी तो ऐसा भी होता था कि हम बारिश में सायकल लेकर फंस जाते थे और हमारी बहुत बुरी दशा हो जाती थी. लेकिन पढ़ाई करने तो जाना ही थी. 
    तब हम उस समय रोज़ ये सोचा करते थें कि क्या हमारे गाँव से भी कोई सड़क हमारे स्कूल तक जायेगी. क्या वो दिन आयेंगें जब हमारी सायकल कभी पक्की सड़क पर दौड़ेगी...? 

    पर ऐसा नही हो सका और देखते-देखते हम लोगों ने मैट्रिक पास कर लिया.

    मैट्रिक की पढ़ाई के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए पटना चला . लेकिन तब भी दिल में मेरे यही चाहत थी कि हमारा गाँव ज़ल्दी से ज़ल्दी विकास की राहों पर अग्रसर हो जाए. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. समय बीतता गया और हमारे बाद हमारे गाँव के अन्य छात्रों को भी इस समस्या से जूझना पड़ा. जब भी मैं पटना से गाँव आता था, सबसे पूछा करता था- कुछ विकास की बात चल रही है या नहीं? ज़वाब आता था नहीं...और कोई-कोई तो ये भी कहता था कि यहाँ विकास कभी नहीं हो पायेगा. तब दिल उदास हो जाता था और फिर मुझे भी ये लगने लगा था कि अब ये गाँव सचमुच विकास नहीं कर पायेगा. लेकिन कहते हैं  न कि "वक़्त तो लगता है, पर तक़दीर बदल जाती है  चाह ले अगर इंसान तो तक़दीर बदल जाती है ".

    और सचमुच, अब मेरे गाँव की तस्वीर और तक़दीर बदलती नज़र आ रही है. बेशक मेरे गाँव के लोग भी बहुत खुश हैं, इस सड़क के बन जाने से. उनकी मुस्कान ये बयाँ करती है और मानो कह रही है कि अब हम भी ज़माने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए तैयार हैं. हम होंगे कामयाब. 

    हालांकि दियारा क्षेत्र में बसे इन गांवों को और भी विकास की ज़रूरत है. लेकिन फिलहाल एक सड़क बन जाने से लोगों को थोड़ा सुकून मिला है और जीना नया जूनून मिला है. 

    और मैं तो बहुत खुश हूँ, क्योंकि देर से ही सही, जिसकी कल्पना मैं कभी वर्षों पहले किया करता था, आज वो हकीकत में बदल गया है. दिल कर रहा है आज ही शहर से गाँव जाऊं और उस सड़क को जी भर कर देखूं, जो मेरे गाँव से गुज़र रही है. 

    तो दोस्तों !! गाँव के बारे में लिखा हुआ मेरा ये लेख आपको कैसा लगा. ज़रूर बताईये.

    CONCLUSION
    दोस्तों!! मुझे अपने गाँव से बहुत प्यार है, इसलिये मैं गाँव पर कुछ ना कुछ लिखता रहता हूँ। आप लोगों को अच्छा लगे तो कमेंट ज़रूर करें।



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